कोई जगह नहीं है आराम करने के लिए | तंग गर्मी के बीच भारतीय शहरों में राहत असमान रूप से वितरित

भारत में बढ़ती गर्मी और सार्वजनिक स्थानों की कमी ने शहरी डिजाइन में छुपी असमानता को उजागर कर दिया है। महंगे इलाकों में छांव के पर्याप्त साधन होते हैं, जबकि आम आबादी को भीषण धूप से कोई राहत नहीं मिल पाती। इस स्थिति ने गर्मी से बचाव संबंधी सुविधाओं में एक बड़ा वर्गीय विभाजन पैदा कर दिया है।
शहरों में तेजी से बढ़ती गर्मी के कारण छांव और ठंडे स्थानों की जरूरत दिन-ब-दिन बढ़ रही है। लेकिन सार्वजनिक स्थानों की कमी और शहरी नियोजन की प्राथमिकताएं अधिकतर संपन्न इलाकों की ओर केन्द्रित हैं। इसके चलते आम जनता खासकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग खुले धूप और गर्मी के दौर से गुजरने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, शहरी विकास नीतियों में भ्रष्टाचार और असमान संसाधन आवंटन ने स्थिति और भी विकट बना दी है। प्रसिद्ध शहरी योजनाकार डॉ. अजय सिंह कहते हैं, “जब हमें शहर की सतत विकास और सामाजिक समानता की बात करनी होती है, तो हमें दिखता है कि हर वर्ग की पहुंच में यह सुविधा समान नहीं है। छायादार बाग़ीचे, पार्क और पेड़ मुख्य रूप से संपन्न इलाकों में केंद्रित होते हैं।”
शहरों में बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचने के लिए छायादार इलाकों की बढ़ोतरी बेहद जरूरी है। इसके लिए कड़े नियम बनाना होंगे तथा सार्वजनिक और निजी भागीदारी से अधिक से अधिक हरे-भरे स्थान बनाना होंगे।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्थानीय निकायों को प्रभावी और समावेशी योजनाएं बनानी चाहिएं, ताकि कम संसाधन वाले क्षेत्रों में भी पर्यावरणीय राहत मिल सके। एक समृद्ध और सशक्त नागरिक समाज के लिए यह जरूरी है कि शहरी योजना में सभी वर्गों की जरूरतों को समान रूप से ध्यान में रखा जाए।
वर्तमान में, यदि इस असमानता को नहीं सुधारा गया, तो गर्मी के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याएं और सामाजिक तनाव बढ़ने की संभावना बनी रहेगी। इसलिए शहरी विकास में पर्यावरण के साथ-साथ सामाजिक न्याय को भी प्राथमिकता देना आवश्यक है।
नतीजतन, सरकार, योजना निर्माता और नागरिकों के बीच समन्वय और जागरूकता बढ़ाकर ही शहरों को रहने योग्य और हर वर्ग के लिए समान रूप से सुकूनदायक बनाया जा सकता है। अलग-अलग तबके के लोगों के लिए छांव और आराम के स्थान उपलब्ध कराना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन गया है।






