मिलिए अनुराग मालू से, वह पर्वतारोही जो ग्लेशियरों की आवाज़ बन गए हैं

किशनगढ़, राजस्थान। अनुराग मालू का नाम उन लोगों में गिना जाता है जिन्होंने अपने साहस और अनूठे समर्पण के द्वारा हिमालय के परिदृश्य को नई दिशा दी है। वे एक ऐसे पर्वतारोही हैं जिन्होंने दुनिया के सबसे खतरनाक पर्वत पर चढ़ाई के दौरान मौत को करीब से देखा, लेकिन मजबूती और दृढ़ संकल्प के साथ फिर से जीवन को अपनाया। अपनी दूसरी जिंदगी को उन्होंने उन पर्वतों को समर्पित कर दिया जिन्होंने उन्हें जिंदा रखा।
अनुराग का जन्म और पालन-पोषण राजस्थान के छोटे शहर किशनगढ़ में हुआ। बचपन से ही प्रकृति और पर्वतारोहण में उनकी गहरी रुचि रही, लेकिन विशेषज्ञता और प्रशिक्षण के लिए उन्होंने कई वर्षों तक कठिन परिश्रम किया। उनका सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वे एक अत्यंत खतरनाक चोटी पर चढ़ाई के दौरान लगभग अपनी जान गंवाने वाले थे। उनकी यह अनुभव उन्होंने व्यक्त किया कि जीवन का मूल्य क्या होता है और प्रकृति की शक्ति के प्रति सम्मान बढ़ा।
इस घटना के बाद अनुराग ने फैसला किया कि वे केवल पर्वतारोहण नहीं करेंगे बल्कि ग्लेशियरों के संरक्षण और उनके महत्व को भी लेकर जागरूकता फैलाएंगे। वह अब ग्लेशियरों की भाषा बोलते हैं, उनकी कहानी दुनिया के सामने रखते हैं। उनका मानना है कि ग्लेशियर न केवल पर्वतारोहण की सुंदरता का स्रोत हैं, बल्कि जल संकट से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए जीवनदायिनी हैं।
अनुराग ने विभिन्न पर्यावरण संगठनों और सरकारी विभागों के साथ मिलकर ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए अभियान चलाए हैं। उन्होंने किशनगढ़ से लेकर हिमालयी क्षेत्रों तक यात्राएं कीं और स्थानीय समुदायों को ग्लेशियरों के महत्व और संरक्षण की आवश्यकता के बारे में शिक्षित किया। उनके प्रयासों की वजह से कई युवा पर्वतारोहियों में भी पर्यावरण जागरूकता बढ़ी है।
उनका जीवन अब प्रेरणा का स्रोत है और वे कहते हैं, “प्रकृति ने मुझे एक बार बचाया, अब मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं उसका संरक्षण करूं। विशाल हिमालय की चोटियों पर छिपे इस खजाने को हम सभी को बचाना होगा।”
अनुराग मालू की कहानी उस शक्ति और साहस की मिसाल है जो प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी उम्मीद और कामयाबी की राह खोल सकती है। उनका समर्पण और environmental advocacy हमें यह याद दिलाता है कि पर्वत केवल चढ़ने के लिए नहीं बल्कि उनके संरक्षण के लिए भी हमारे क्रियाकलाप महत्वपूर्ण हैं।





