उत्तर प्रदेश

आपराधिक अपील लंबित रहने पर दोषियों को अवकाश देने में कोई रोक नहीं, मद्रास हाई कोर्ट के पांच-जज पैनेल का आदेश

चेन्नई: मद्रास उच्च न्यायालय के पांच सदस्यीय बड़े बेंच ने दोषियों को उनकी सजा के खिलाफ लंबित अपील के दौरान अवकाश देने में कोई बाधा नहीं होने का आदेश दिया है। यह आदेश उस संदर्भ में आया है जब सुप्रीम कोर्ट में एक संबद्ध मामले की अंतिम सुनवाई लंबित है और इससे पहले दो-न्यायाधीशीय डिवीजन बेंच ने बड़े बेंच को यह मामला सौंपा था।

उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि अपील प्रक्रिया पूरी होने तक दोषियों को अवकाश नहीं देने की कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है। बेंच ने यह भी कहा कि अवकाश के मुद्दे पर न्यायिक विवेकपूर्ण विचार-विमर्श करना आवश्यक है और उसे किसी कठोर या यांत्रिक नियम के अधीन नहीं रखा जा सकता।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब न्यायपालिका में सजा भुगत रहे व्यक्तियों के अधिकारों और कर्तव्यों पर नई व्याख्या की आवश्यकता स्पष्ट हो रही है। कोर्ट ने यह रुख अपनाया है कि जहां तक न्यायिक प्रक्रिया की गति संभव हो, दोषियों को मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के समीप प्रस्तुत मामला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें अवकाश और अपील के संबंध में नियमों की समीक्षा की जा रही है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि अंततः सुप्रीम कोर्ट का आदेश ही इस विषय पर अंतिम निर्णय होगा, और तब तक सभी संबंधित पक्ष इस अंतरिम आदेश का पालन करें।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय कानून की आत्मा के अनुरूप है और इससे न्यायपालिका की संवेदनशीलता तथा दोषियों के मूल अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होगी। साथ ही, यह आदेश न्यायिक प्रणाली की प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को भी सपोर्ट करता है।

इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट के पांच जजों की बड़ी बेंच ने जिस तरह से न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए निर्णय दिया है, उसे कानूनी जगत में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। न्यायमूर्ति ए, न्यायमूर्ति बी, न्यायमूर्ति सी, न्यायमूर्ति डी और न्यायमूर्ति ई की अध्यक्षता वाली इस बेंच ने स्पष्ट किया कि अपील लंबित है, इसका अर्थ दोषी को अवकाश देने से मना करना नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

इस फैसले से यह उम्मीद जगी है कि न्यायालयों में दोषियों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा होगी और न्याय प्रक्रिया अधिक न्यायसंगत एवं मानवीय होगी। यह न्यायपालिका द्वारा संवैधानिक दायित्वों की पूर्ति की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

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