स्पेस रेस में चीन की बड़ी छलांग! क्या इलेक्ट्रिक लॉन्चर बदल देगा रॉकेट तकनीक का भविष्य?

बीजिंग, चीन
अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में चीन लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। हाल ही में चीन ने अपने रियूजेबल लॉन्ग मार्च 10B रॉकेट के पहले चरण के बूस्टर का सफल परीक्षण किया। इस परीक्षण में बूस्टर समुद्र में बने विशेष प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित उतर गया। इस उपलब्धि के साथ चीन अमेरिका के बाद पुन: उपयोग किए जा सकने वाले रॉकेट तकनीक में बड़ी सफलता हासिल करने वाले देशों में शामिल हो गया है।
अब चीन की नजर अंतरिक्ष प्रक्षेपण की अगली पीढ़ी की तकनीक पर है। रिपोर्टों के मुताबिक वह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम विकसित कर रहा है, जिसका उद्देश्य रॉकेट को उड़ान की शुरुआत में बिजली की सहायता से अतिरिक्त गति देना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह तकनीक सफल होती है तो अंतरिक्ष मिशनों में ईंधन की खपत कम करने और लागत घटाने में मदद मिल सकती है।
वर्तमान में दुनिया के लगभग सभी ऑर्बिटल रॉकेट केमिकल इंजन पर आधारित हैं। रॉकेट को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसके लिए भारी मात्रा में ईंधन जलाना पड़ता है। यही कारण है कि रॉकेट का बड़ा हिस्सा ईंधन से भरा होता है और मिशन की लागत भी काफी अधिक रहती है।
एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने फाल्कन 9 और स्टारशिप जैसे रियूजेबल रॉकेट विकसित कर अंतरिक्ष उद्योग में बड़ा बदलाव लाया है। फाल्कन 9 का पहला चरण सफलतापूर्वक वापस लौटकर दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, जिससे लॉन्च की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है। इसके बावजूद स्पेसएक्स की तकनीक अभी भी केमिकल ईंधन पर ही आधारित है।
चीन का प्रस्तावित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम इस प्रक्रिया में बदलाव लाने की कोशिश करता है। इसके तहत रॉकेट को जमीन पर बने लंबे ट्रैक पर शक्तिशाली इलेक्ट्रिक मोटरों से तेज गति दी जाएगी। जब रॉकेट आवश्यक प्रारंभिक गति हासिल कर लेगा, तब उसके केमिकल इंजन चालू होंगे। इससे उड़ान के शुरुआती चरण में ईंधन की आवश्यकता कम हो सकती है।
रिपोर्टों के अनुसार चीन ने तिब्बत के पठारी क्षेत्र के पास इस तकनीक से जुड़े हाई-टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग सिस्टम का प्रारंभिक परीक्षण भी किया है। हालांकि इस परियोजना को व्यावहारिक रूप देने के लिए विशाल बुनियादी ढांचे, अत्यधिक ऊर्जा क्षमता और सटीक नियंत्रण प्रणाली की आवश्यकता होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि निकट भविष्य में यह तकनीक स्पेसएक्स के केमिकल रॉकेटों का विकल्प नहीं बनेगी। अंतरिक्ष की कक्षा तक पहुंचने के लिए रॉकेट को अंततः अपने केमिकल इंजनों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि यदि चीन इस तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो भविष्य में कम लागत और अधिक क्षमता वाले अंतरिक्ष मिशनों का नया दौर शुरू हो सकता है।






