30 के दशक में भारतीयों के बीच हिप रिप्लेसमेंट क्यों बढ़ रहे हैं

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान, भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर जबरदस्त दबाव पड़ा। संक्रमण को रोकने और मरीजों को जीवनरक्षा प्रदान करने के लिए डॉक्टरों ने उच्च मात्रा में कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स का उपयोग किया। हालांकि, इस उपचार ने कई मरीजों में हिप जोड़ों की गंभीर समस्याओं को भी जन्म दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 के दौरान इस्तेमाल किए गए उच्च खुराक वाले कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स ने कुछ मरीजों की जांघ की हड्डी के ऊपरी हिस्से में धमनीरुद्धता (avascular necrosis) जैसी जटिलताओं को बढ़ावा दिया। इस स्थिति में हड्डी का वह हिस्सा धीरे-धीरे कमजोर होकर कमज़ोर हो जाता है, जिससे दर्द और गतिशीलता में कमी होती है। परिणामस्वरूप, 30 साल के आसपास के युवा भी अपनी हिप रिप्लेसमेंट कराने के लिए अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।
डॉक्टरों ने बताया कि कोविड की दूसरी लहर में ये उपचार जीवनरक्षक साबित हुए, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मरीजों को शुरुआती संकेतों में थका हुआ महसूस होना, चलने-फिरने में कठिनाई और हिप में लगातार दर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। तेजी से बढ़ती हिप रोगी संख्या ने ऑर्थोपेडिक सर्जनों के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
कई अस्पतालों में हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी की संख्या में वृद्धि देखी गई है, खासकर 30 से 45 वर्ष की आयु वर्ग में। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोविड-19 के उपचार की कुछ विधाओं के कारण हमारी युवा पीढ़ी को भी गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि उपचार के साथ-साथ पोषण और नियमित स्वास्थ्य जांच भी जरूरी है ताकि ऐसी जटिलताओं से बचा जा सके।
स्वास्थ्य अधिकारियों और चिकित्सकों ने चेताया है कि कोरोनाकालीन इलाज के बाद मरीजों को अपनी हड्डियों और जोड़ों की देखभाल पर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में इस नई चुनौती का समाधान ढूंढ़ने के लिए अनुसंधान और संसाधनों का विस्तार अब सर्वोपरि हो गया है।






