स्वास्थ्य

भारत की मातृत्व स्वास्थ्य कहानी में खोया हुआ कड़ी

नई दिल्ली: भारत में संस्थागत प्रसव, महिलाओं के सशक्तिकरण और मातृत्व कार्यक्रमों में सुधार के बावजूद, देश में स्तनपान की दरों में गिरावट देखी जा रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के आंकड़े इस ओर संकेत देते हैं कि प्रसवोत्तर समर्थन, कार्यस्थल सुरक्षा और मातृत्व लाभों में अभी भी कई कमी बरकरार हैं।

एनएफएचएस-6 के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत में केवल कुछ क्षेत्रों में ही बच्चे का अकेले स्तनपान कराना बढ़ा है जबकि कुल मिलाकर यह प्रतिशत गिरावट पर है। इससे स्पष्ट होता है कि सामाजिक, आर्थिक और चिकित्सा पहलों की दिशा में अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल संस्थागत जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रसवोत्तर मातृ देखभाल, पोषण संबंधी जागरूकता और महिलाओं को आर्थिक व सामाजिक समर्थन की जरूरत है। खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां घरेलू जिम्मेदारियों और पारंपरिक सोच के चलते माताओं को सही पैरेंटिंग सहायता नहीं मिल पाती।

मातृत्व से जुड़ी नीतियों और कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा में भी अंतर नजर आता है। कई स्थानों पर मातृत्व अवकाश नियमों का ठीक से पालन नहीं हो पाता, जिससे महिलाएं अपने नवजात के लिए आवश्यक समय नहीं निकाल पाती हैं। इसके अलावा, स्तनपान संबंधी जागरूकता अभियान भी ज्यादा प्रभावी होने चाहिए ताकि महिलाओं को सही जानकारी मिल सके।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में माताओं को पोषण संबंधी सहायता, स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच और शिक्षा की जरूरतें बनी हुई हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि केवल सरकार की स्कीमें ही काफी नहीं हैं, बल्कि समुदाय स्तर पर भी जागरूकता और सहभागिता जरूरी है।

नतीजतन, स्तनपान के समर्थन में उपेक्षा, प्रसवोत्तर देखभाल की कमी और कार्यस्थल पर मातृत्व सुविधाओं की अनुपलब्धता की वजह से माताओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य और विकास पर पड़ता है।

स्वास्थ्य व पोषण विशेषज्ञ बिंदु शाजन पेरपाडन के अनुसार, “इस मुद्दे को हल करने के लिए हमें सामाजिक, चिकित्सा और आर्थिक पहलुओं को एक साथ लेकर काम करना होगा। मातृत्व स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार तभी संभव होगा जब हम महिलाओं की व्यापक जरूरतों को समझकर नीतियां बनाएं।”

इसलिए आवश्यक है कि न केवल अस्पतालों में प्रसव सेवाओं को बेहतर बनाया जाए बल्कि माताओं को प्रसवोत्तर सही देखभाल, पोषण और मानसिक समर्थन भी मिले। साथ ही, कार्यस्थल पर मातृत्व अधिकारों की रक्षा के लिए कड़े नियम लागू किए जाएं।

मातृत्व स्वास्थ्य के इस अहम विषय पर ध्यान देना भारत के समग्र स्वास्थ्य विकास के लिए जरूरी है। स्तनपान की गिरती दरें एक चेतावनी संकेत हैं, जो बताती हैं कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। केवल कमर कसकर और सामूहिक प्रयासों से ही भारत की मातृत्व कहानी को पूर्ण सफलता के छोर तक पहुंचाया जा सकता है।

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