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ड्रग-प्रतिरोधी मलेरिया: उपचार और उन्मूलन प्रयासों के लिए बढ़ती चुनौती

नई दिल्ली। भारत में मलेरिया नियंत्रण और उन्मूलन प्रयासों के सामने अब एक गंभीर चुनौती आ खड़ी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, आर्टेमिसिनिन-आधारित उपचारों के प्रति मलेरिया परजीवी में विकसित हो रहे रोध प्रतिरोध ने इस बीमारी को नियंत्रित करना कठिन बना दिया है। यह स्थिति न केवल रोगियों के लिए उपचार की जटिलता बढ़ा रही है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर मलेरिया उन्मूलन की योजनाओं को भी प्रभावित कर रही है।

मलेरिया प्रमुख रूप से प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम नामक परजीवी के कारण होता है, जो मच्छरों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है। आर्टेमिसिनिन आधारित संयोजित उपचार (ACT) वर्तमान में मलेरिया का सबसे प्रभावी इलाज माना जाता है, लेकिन अब भारत के कुछ क्षेत्रों में इस दवा के प्रति परजीवी के प्रतिरोधी होने की पुष्टि हो रही है। इससे रोग का इलाज कठिन हो रहा है और मौतों का खतरा बढ़ रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों व भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्टेमिसिनिन प्रतिरोधी मलेरिया के मामले सामने आ रहे हैं। यह स्थिति सरकार की मलेरिया उन्मूलन नीति के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रही है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि जांच और निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जाए, ताकि नए प्रतिरोधी मामलों का समय पर पता चल सके।

औषधि प्रतिरोधित मलेरिया के उपचार के लिए वैकल्पिक दवाओं और उपचार विधियों की खोज जरूरी है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना प्रभावी उपाय किए, मलेरिया नियंत्रण में पिछले वर्षों में हुई प्रगति धराशायी हो सकती है। सरकार को चाहिए कि वह स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ कर, ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में जागरूकता बढ़ाए तथा मलेरिया पर विशेष ध्यान दे।

मलेरिया उन्मूलन के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं, लेकिन आर्टेमिसिनिन प्रतिरोधी मलेरिया के बढ़ते मामलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि निरंतर वैज्ञानिक शोध, दवाओं का समयबद्ध वितरण, और प्रभावी नियंत्रण रणनीतियों के जरिए ही इस गंभीर समस्या से निपटा जा सकता है।

इस संदर्भ में, विशेषज्ञ और नीति निर्माता मिलकर इस चुनौती का सामना करते हुए, मलेरिया को भारत से पूरी तरह समाप्त करने के लक्ष्य को हासिल करने में जुटे हैं। स्वस्थ भारत के लिए मलेरिया नियंत्रण जरूरी है, और इसके लिए मानवीय प्रयासों के साथ-साथ तकनीकी और वैज्ञानिक सहयोग भी अहम होगा।

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