तिरुपति मंदिर की पहली आरती पर छिड़ा विवाद, विधायकों-सांसदों को अधिकार देने के प्रस्ताव का मंदिर बोर्ड ने किया विरोध

तिरुपति, आंध्र प्रदेश
तिरुपति स्थित भगवान श्री वेंकटेश्वर मंदिर की पहली नित्य आरती में सांसदों और विधायकों को शामिल करने के प्रस्ताव को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के हालिया बयान के बाद तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) से जुड़े पदाधिकारियों ने इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह अधिकार सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा है और इसमें किसी भी तरह का बदलाव मंदिर की परंपराओं के विपरीत होगा।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब डी.के. शिवकुमार ने कहा कि वह एक ऐसा प्रस्ताव लाने के पक्ष में हैं, जिसके तहत पहली आरती में मंत्री, सांसद, विधायक, न्यायाधीश या सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य लोगों को भी शामिल होने की अनुमति दी जा सके। उन्होंने इसे अपने कार्यकाल की महत्वपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि राज्य की सेवा करने वाले जनप्रतिनिधियों को भी भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद लेने का अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) बोर्ड के सदस्य जी. भानुप्रकाश रेड्डी ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि पहली आरती में शामिल होने का विशेषाधिकार ऐतिहासिक रूप से केवल मैसूर राजपरिवार को प्राप्त है। उन्होंने कहा कि इस धार्मिक परंपरा को राजनीतिक निर्णयों के आधार पर नहीं बदला जा सकता। रेड्डी ने डी.के. शिवकुमार से इस मुद्दे का राजनीतिकरण न करने की अपील करते हुए कहा कि तिरुपति मंदिर आस्था का केंद्र है, न कि राजनीतिक बहस का मंच।
तिरुपति मंदिर का मैसूर राजपरिवार से ऐतिहासिक संबंध रहा है। मान्यता है कि विजयनगर साम्राज्य और मैसूर राजपरिवार ने मंदिर के संरक्षण और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसी ऐतिहासिक परंपरा के तहत मैसूर राजपरिवार को भगवान वेंकटेश्वर की पहली नित्य आरती में शामिल होने का विशेष अधिकार मिला। चूंकि राजपरिवार का कोई सदस्य हमेशा तिरुपति में मौजूद नहीं रह सकता, इसलिए उनकी ओर से एक अधिकृत प्रतिनिधि इस धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होता है।
रिपोर्टों के अनुसार, डी.के. शिवकुमार इसी अधिकृत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था में बदलाव का सुझाव दे रहे हैं, ताकि कर्नाटक सरकार के प्रतिनिधियों को भी इस विशेषाधिकार में शामिल किया जा सके। हालांकि मंदिर बोर्ड का कहना है कि ऐसी किसी भी व्यवस्था में बदलाव से अन्य राज्यों की ओर से भी समान मांग उठ सकती है, जिससे मंदिर की परंपराओं पर असर पड़ने की आशंका है।
फिलहाल इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है। मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक परंपराओं से जुड़े किसी भी विषय पर अंतिम निर्णय संबंधित नियमों और स्थापित परंपराओं के अनुरूप ही लिया जाएगा। इस बीच, यह मुद्दा धार्मिक परंपरा और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर नई बहस का विषय बन गया है।






